आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

धूल की भूल

                
                                                         
                            धूल को भी अभिमान हो गया
                                                                 
                            
जब हवा का साथ मिला
उड़ने लगी और आकाश में छा गई
गर्व से कहने लगी देखो जरा
आज मेरे समान कोई नहीं
जल हो या थल, नभ हो या दिशाएँ
जिधर देखो आज बस मैं ही मैं हूं

बादल ने जब देखा धूल को घमंड से सर उठाए
वो अट्टहास करने लगा
उसने जल की बूंदें बरसाईं
फिर क्या था औंधे मुँह
धूल धरा पर आ गिरी
दिशाएं साफ हो गईं
चहुँ ओर सौंदर्य का साम्राज्य छा गया
धरती ने पूछा रेणुके तुमने अपने
उत्थान पतन से क्या सीखा
धूल को पछतावा हुआ
वो बोली उन्नति पा कर
अभिमान नहीं करना चाहिए
अभिमान करनेवाले का पतन सुनिश्चित होता
अतः अभिमान मत करो
चाहे कितनी ऊंचाई पा जाओ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर