सुख का दुख, अच्छे का बुरा
पर आनंद का विलोम नहीं होता
आनंद बस आनंद है
आनंद बाहरी साधनों में नहीं
वह तो अपने भीतर ही विद्यमान है
स्वयं में आनंद सकारात्मक सोच में निहित होता
अपनी कमियों को स्वीकार
निरंतर आत्मिक विकास करना
छोटी छोटी उपलब्धियों से खुश होना
आनंद के लक्षण हैं
भगवान बुद्ध ने भी कहा
सुख दुख भीतर से उदित होते
किसी को एक वस्तु सुख देती
वहीं वस्तु दूसरे के दुख का कारण होती
ध्यान, योग, स्वाध्याय सेवा
प्रकृति के समीप बिताया समय
मन को निर्मल और शांत करते
जो मानव स्वयं में आनंद खोज लेता
वह हर स्थिति में अडिग रहता
वह स्वयं तो सुख शांति पाता
दूसरों को भी आनंद से भर देता