उन सात दिनों में मैं और ईश्वर एक दूसरे से लड़ते रहे ।
मुझे ईश्वर से सवालों के जवाब के लिए लड़ना पड़ा,
और ईश्वर को ईश्वर बने रहने के लिए मुझसे लड़ना पड़ा।
ईश्वर ने सारे नियम अपने सहूलियत के हिसाब से बनाए थे, जैसे हर बार उसी की चलती है,
तो इस बार भी उसी की चली ।
हम दोनों के बीच एक सिक्का उछाला गया
और पहली बारी ईश्वर की आई।
ईश्वर ने आँखों के साथ- साथ
कानों पर भी पट्टी बांध ली थी ।
आखरी के सात दिनों तक ईश्वर मौन में रहा,
और मैं उसकी पूजा - अर्चना में,
आँठवे दिन मैंने मान लिया ईश्वर पत्थर बना रहना चाहता है ।