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थकन भी है

Onkar Nath Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            थक गया हूं घर जाना चाहता हूं,
        
                                                    
                            
बेपरवाह होके सोना चाहता हूं।
थक गई है जिंदगी मीठे लोगों से,
अब इनसे दूर रहना चाहता हूं।
स्वाद लेते लेते जीभ जल गई,
अब जीभ बचना चाहता हूं।
थक गया हूं इस उमस भरी जिंदगी से
अब मारना चाहता हूं।


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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