अपनी शिकस्त को राह-ए-फतह बनाया हमने।
अपनी शिकस्त को राह-ए-फतह बनाया हमने।
हर गिरने वाले को सहारा देकर उठाया हमने।।
ये सच है, तेरे हिज्र में ग़मगीन बहुत थे हम।
तेरी यादों को जीने का सहारा बनाया हमने।।
ज़िक्र-ए-वुसअत-ए-दुनिया से हुआ क्या हासिल।
अपने घर को ही अपना जहाँ बनाया हमने।।
सफ़र-ए-ज़िंदगी में कोई हमक़दम न मिला'ओम'।
गैरों को ही राह -ए -हमसफ़र बनाया हमने।।
ज़िक्र-ए-वुसअत-ए-दुनिया:दुनिया की विशालता
का ज़िक्र।
-ओम गोपाल शर्मा