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अपनी शिकस्त को राह-ए-फतह

                
                                                         
                            अपनी शिकस्त को राह-ए-फतह बनाया हमने।
                                                                 
                            

अपनी शिकस्त को राह-ए-फतह बनाया हमने।
हर गिरने वाले को सहारा देकर उठाया हमने।।

ये सच है, तेरे हिज्र में ग़मगीन बहुत थे हम।
तेरी यादों को जीने का सहारा बनाया हमने।।

ज़िक्र-ए-वुसअत-ए-दुनिया से हुआ क्या हासिल।
अपने घर को ही अपना जहाँ बनाया हमने।।

सफ़र-ए-ज़िंदगी में कोई हमक़दम न मिला'ओम'।
गैरों को ही राह -ए -हमसफ़र बनाया हमने।।

ज़िक्र-ए-वुसअत-ए-दुनिया:दुनिया की विशालता
का ज़िक्र।
-ओम गोपाल शर्मा 
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3 महीने पहले

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