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बचपन कहाँ चला गया

nutan Kumari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बचपन कहाँ चला गया
        
                                                    
                            

याद आती है हमें
बचपन की वो घड़ियाँ,
बच्चों की किलकारियों से
गूँजा करती थीं गलियाँ।

मिट्टी के खिलौनों में
छिपी रहती थीं हमारी नादानियाँ,
दादी की ज़ुबाँ से रोज़
सुना करती थीं नई-नई कहानियाँ।

न खिलौनों की कोई चाह थी,
न ही किसी बात की परवाह थी,
बस दोस्तों का साथ ही
हमारे जीवन की एक मिठास थी।

मगर आज बचपन
जा रहा है कहाँ?
मोबाइल की स्क्रीन पर,
या रील्स और वीडियोज़ के सीन पर।

नहीं मिलते हैं माटी के खिलौने
अब बाज़ारों में,
और न ही सुनाई देती हैं
दादी की कहानियाँ अब रातों में।

मैदानों का वो शोर
मौन हो चुका है,
और दोस्तों का झुंड
अब ग़ायब हो चुका है।

घर की चारदीवारी में
सिमट चुका है बचपन,
व्हाट्सऐप की चैट पर
बिखर रहा है जीवन।

क्या पता किस मोड़ पर
छूट गईं वो नटखट शरारतें,
कहाँ खो गई है वो बेफिक्र हँसी
और मासूम आदतें।

अब भी वक्त है हमें
अपने बचपन को वापस लाने का,
छोड़कर स्क्रीन की दुनिया,
अपनी ज़मीन और मिट्टी से जुड़ जाने का।
— नूतन झा
एक महीने पहले
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