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तिजोरी का हिसाब

Nupur Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जो जोड़ रहे थे एक-एक तिनका,
        
                                                    
                            
गहने और कपड़ों के नाम पर,
काश! वो धन लग जाता बेटियों की
उड़ानों और किसी मुकाम पर।

शादी के उस एक दिन की
भव्यता पर जो लुटा दिया,
दूजे हाथ सौंपने को उन्हें,
जो वर्षों से बचा के रखा था।

यदि वही पूँजी बन जाती
उनकी नींव, उनकी स्वतंत्रता,
तो आज न होतीं वो आश्रित,
होती जीवन भर आत्मनिर्भरता।

न माँगनी पड़ती इजाज़त उन्हें
अपनी ही कुछ छोटी ख़्वाहिशों की,
न सहनी पड़ती यूँ ख़ामोशी
दूसरों की मर्जी और फरमाइशों की।

बाबुल! काश सब समझ पाते,
कन्यादान से बड़ा होता है 'समर्थ' बनाना,
किसी और के हाथों में सौंपने से बेहतर,
उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना।

आज भी जब देखती हैं वो जेवर,
तो बस एक ही मलाल उठता है—
काग़ज़ के उन नोटों से
अगर बेटियों का स्वाभिमान ख़रीदा होता ! ।

- (नुपुर झा)
2 महीने पहले
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