आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तिजोरी का हिसाब

                
                                                         
                            जो जोड़ रहे थे एक-एक तिनका,
                                                                 
                            
गहने और कपड़ों के नाम पर,
काश! वो धन लग जाता बेटियों की
उड़ानों और किसी मुकाम पर।

शादी के उस एक दिन की
भव्यता पर जो लुटा दिया,
दूजे हाथ सौंपने को उन्हें,
जो वर्षों से बचा के रखा था।

यदि वही पूँजी बन जाती
उनकी नींव, उनकी स्वतंत्रता,
तो आज न होतीं वो आश्रित,
होती जीवन भर आत्मनिर्भरता।

न माँगनी पड़ती इजाज़त उन्हें
अपनी ही कुछ छोटी ख़्वाहिशों की,
न सहनी पड़ती यूँ ख़ामोशी
दूसरों की मर्जी और फरमाइशों की।

बाबुल! काश सब समझ पाते,
कन्यादान से बड़ा होता है 'समर्थ' बनाना,
किसी और के हाथों में सौंपने से बेहतर,
उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना।

आज भी जब देखती हैं वो जेवर,
तो बस एक ही मलाल उठता है—
काग़ज़ के उन नोटों से
अगर बेटियों का स्वाभिमान ख़रीदा होता ! ।

- (नुपुर झा)
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर