ग़ज़ल
देखकर तुम्हे तो, मौसम भी मेहरबान था,
हर नज़ारा जैसे, धरती पे आसमान था।
बादलों की ओट से, सूर्य भी मु-स्का रहा,
दिल ये फिर मचल उठा, सोया अ'रमान था।
ठंडी-ठंडी चल रही थी, ये पुर सुकूँ हवा,
हर घड़ी में प्यार का, मीठा सा गुमान था।
फूल भी खिले यहाँ, पत्ते भी झुमे यहाँ,
हर बे-जान चीज में भी, नया सा जान था।
शाम को नवीं, चला बात करने उसके घर,
आँख में नमी थी, दिल मेरा बेज़ुबान था।
- प्रेमयाद कुमार नवीन