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मौसम–ए–मेहरबान

                
                                                         
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देखकर    तुम्हे तो,   मौसम भी मेहरबान था,
हर नज़ारा     जैसे,    धरती पे आसमान था।

बादलों की    ओट से,    सूर्य भी मु-स्का रहा,
दिल ये फिर मचल उठा,  सोया अ'रमान था।

ठंडी-ठंडी चल  रही थी,      ये पुर  सुकूँ हवा,
हर घड़ी में     प्यार का, मीठा  सा गुमान था।

फूल भी खिले      यहाँ,   पत्ते  भी झुमे यहाँ,
हर बे-जान चीज में भी,   नया  सा जान था।

शाम को     नवीं, चला बात करने उसके घर,
आँख में नमी थी,   दिल    मेरा  बेज़ुबान था।
- प्रेमयाद कुमार नवीन 
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1 hour ago

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