एक हाथ में विष का प्याला
एक हाथ में धरी कटार
आज तजेंगे प्राण मगर
दुश्मन से ना मानेंगे हार।।
क्या समझ रहे थे तुम अबला
जो हाथों में आ जायेंगे
हम वीर शेरनी की जाई
हम तुमको धूल चटायेंगे।।
है लाज शरम गहना माना
घूँघट में शीश छुपाते हैं
पर वक़्त पड़े तो बन काली
रण में तलवार चलाते हैं।।
नासमझ समझ का फेर है ये
हम दास तेरे हो जायेंगे
यदि वक़्त पड़ा तो अग्नि पे
जौहर का खेल दिखायेंगे।।
ये हिन्द देश की छत्राणी
ना कदम हटायेंगी पीछे
तू कदम बढ़ा के देख जरा
कुचलेंगें क़दमों के नीचे।।
तुझ जैसे नीच नराधम को
हम कभी शरण ना आयेंगे
पग आज बढ़ा के देख जरा
तुझको औकात दिखायेंगे।।
राज महल की दीवारों को
हम श्मशान बनायेंगे
धरती माँ की आन की खातिर
अपनी चिता जलायेंगे।।
शर्म लुटा के जीने से
बेहतर होती है वीरगति
जब तक थे तन में प्राण
यही कह रही थी रानी पद्मावती।।
- नीतू ठाकुर
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