साक्ष्य रहे हैं देव, भक्त, गुरु, संतों ने यह सत माना है,
यूँ ही नहीं रंगे हम राम-रंग में, कोई खेल पुराना है।
यह रंग नहीं जो धुल जाए, यह भीतर की वह ज्वाला है,
जिसने जग का मोह जलाकर, राम-प्रेम को पाला है।
उठते, बैठते, चलते, थकते, श्वासों में वह ढल जाते हैं,
यूँ ही नहीं ये प्राण धड़कते, राघव हवा बन समाते हैं।
मैं जो लूँ उच्छवास तो उनमें, उनकी ही खुशबू आती है,
मेरी हर एक आह प्रभु के, चरणों तक होकर आती है।
केसर, हल्दी और चंदन, उँगली जब मस्तक पर धरती है,
यह मात्र रस्म नहीं, सखी! यह उनकी देह को स्पर्श करती है।
धन्य हुई वह उँगली, जिसे मिला सौभाग्य रघुवर के वंदन का,
जो राम को छू ले, वही तो दर्पण है इस जीवन का ।
प्रेम में, शांति में, एकांत में, मन की गहराई में शोर है,
भीतर बैठा वह चितचोर, खींचता अपनी ओर है।
यूँ ही नहीं ये नयन बरसते, सावन की इन बूंदों में,
कुछ तो मायापति ने खेला, नैनों की इन कोरों में।
वेद, पुराण, शास्त्र सभी, बस गा-गा कर थक जाते हैं,
पर राम तो केवल प्रेम-गली में, नंगे पाँव ही आते हैं।
यूँ ही नहीं अज्ञानी हम, हमें तर्क का जाल नहीं भाता,
जहाँ बुद्धि की सीमा खत्म हो, वहाँ से राम का नाता।
भस्म को, धूल को, राख को, मिट्टी को, अंग पर जो लगाया है,
यूँ ही नहीं हम बावले हुए, रघुनाथ जी की महक का साया है।
दुनिया कहती पागल हमको, हम दुनिया को देख मुस्कुराते हैं,
शहंशाह हैं हम अपनी मस्ती के, क्योंकि राम को अपना बताते हैं।
सर्दी की ठिठुरन, गर्मी की तपन, या सावन का घनघोर भाव,
सब फीके हैं उस मिलन के आगे, गहरा है विरह का घाव।
यूँ ही नहीं ये उमंग हृदय में, ये तो मिलन की आस है,
जैसे चातक प्यासा बूंद का, मुझे रमापति की प्यास है।
शिव, त्रिकुटा, अहिल्या, शबरी—सबने जिसे अपना माना है,
पत्थर भी तर गए नाम से जिनके, हमने भी वही ठाना है।
यूँ ही नहीं हम ईश मानते, यह उनकी करुणा की धारा है,
राममय कर दिया हमें उन्होंने, यह उपकार ही हमारा है।
आकाश सा विस्तार है उनका, सागर सी गहराई है,
अग्नि सी पावन ज्योति है राम, बाकी सब तो परछाई है।
एक कहूँ राम, दो सीताराम, तीन कहूँ जय सियाराम,
रोम-रोम में गूँज रहा है, अब तो केवल राम-नाम।
संसार में रहकर भी हम, राघव की गलियाँ ढूँढते हैं,
खुद ही बोलते, खुद ही सुनते, सपनों में उनको बुनते हैं।
सौदाई हैं हम, दुनिया की हर रीत से अब मुँह मोड़ लिया,
वो सामने खड़े हैं चुपचाप, हमने खुद को उन पर छोड़ दिया।