ताश के मकाँ टूट कर बिखर जाते हैं
फ़रहत के लम्हे जल्द गुज़र जाते हैं
महफ़िल-ए-रक़्स में दफ़्न तूफ़ानों से
ख़ौफ़ज़दा होकर लोग सिहर जाते हैं
तन्हाई की गिरफ़्त में हमें छोड़कर
ख़ैर-ख़्वाह आख़िर चले किधर जाते हैं
कश्मकश से सराबोर इस ज़िन्दगी में
नामी जंग-आवर भी सुधर जाते हैं
हर पल ख़ुदा की याद में रहने वाले
सब कुछ बिगाड़कर भी संवर जाते हैं
घर में बुज़ुर्गों की ख़िदमत करने वाले
ना-गुज़ीर-हालात में निखर जाते हैं
- निशांत शुक्ल