किस्मत की बेड़ी में बंधा परिंदा
समाज के पिंजरे में बंद है ,
समय की ललकार से ,
उसका भी जी चहता है चील सी उड़ान भरू खुली आंखों से आसमान का सैर करू ,
पर उन्हें पता नहीं किस्मत की बेड़ी में बंधा उनका जीवन समय की चोट से घायल है ,
जी तो चहता है समय को मात दूं ,
समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलूं पर
उनकी टांगें खिंचने वाले अपने हीं हजार है ,
पर समय का क्या वो तो आर - पार है ।
किस्मत की लकीरों से बंधा परिंदा समय का पीछा करते - करते न खुल कर जी पाता है न समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाता है ,
न खुलकर रो पाता है न खुलकर हँस पाता है सामाज के बंधन में बंधा परिंदा कभी तकदीर की लताड से कभी समय की थपेड़ों से मौन हो जाता है ,
किस्मत की लकीरों में बंधा परिंदा ,
कभी गैरो की परछाई से तो
कभी अपनी हीं परछाई से डरकर ,
सदमे में जिता है और सदमे में मर जाता है ,
समय का क्या ना तो उसका कोई सगा ना पराया है ना तो उसकी कोई परछाई है वो तो आर - पार है ।
- रेखा भारती