काले बादल, अंधेरी रात
न कोई आस - पास,
घर को अपने लौट रही
परछाई थी बस मेरे साथ।
मिले राह में कुछ अनजान
हो गई रूह मेरी बेजान,
डरी, सहमी, घबराई हुई
न पता क्या होगा अंजाम।
नजरें नीची, तेजी-सी चाल
डर था कहीं खो न जाए मान,
घबराहट के इस बीच मिली थोड़ी राहत
कहने को अनजान, पर बन गए ढाल।
न पता क्या था नाम
दिया मुझे पूरा मान-सम्मान,
कलयुग के इस दौर में
ऐसा होना चाहिए इंसान।