गुज़रते वक्त को देखा तो देखा मौसम चला गया
चोट के साथ कई चोट देकर मरहम चला गया
जायज़ा लेने जो निकला दुनियां भर के गम का
जितना था पास अपने वो हर गम चला गया
मंजिल दूर है सुनकर मीलों नाप दिया जब
पास होने की अफ़वाह पर फिर कम चला गया
वो 'बेतकल्लुफ' हंसता रहा किसी के गम में
मरा तो सबकी आँखें कर के नम चला गया
मश्क ना करने की गलती ने रिश्ते मिटा दिए कई
पौधों को भूल जाने पर माली का फन चला गया
ज़िद करता रहा बच्चे की तरह मैं एक मोड़ पर
ठहरा रहा मन, झूठ क्यों कहूं मन चला गया
मेरी हथेली से जा गिरता तो भी तसल्ली होती
एक गुब्बारा सीधे आसमान के दामन चला गया
~ नेहाल अहमद
छात्र, बीएड (2021-2023)
मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू सेंट्रल युनिवर्सिटी