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ग़ज़ल: ज़िद करता रहा बच्चे की तरह मैं एक मोड़ पर

Nehal Ahmad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गुज़रते वक्त को देखा तो देखा मौसम चला गया
        
                                                    
                            
चोट के साथ कई चोट देकर मरहम चला गया

जायज़ा लेने जो निकला दुनियां भर के गम का
जितना था पास अपने वो हर गम चला गया

मंजिल दूर है सुनकर मीलों नाप दिया जब
पास होने की अफ़वाह पर फिर कम चला गया

वो 'बेतकल्लुफ' हंसता रहा किसी के गम में
मरा तो सबकी आँखें कर के नम चला गया

मश्क ना करने की गलती ने रिश्ते मिटा दिए कई
पौधों को भूल जाने पर माली का फन चला गया

ज़िद करता रहा बच्चे की तरह मैं एक मोड़ पर
ठहरा रहा मन, झूठ क्यों कहूं मन चला गया

मेरी हथेली से जा गिरता तो भी तसल्ली होती
एक गुब्बारा सीधे आसमान के दामन चला गया

~ नेहाल अहमद
छात्र, बीएड (2021-2023)
मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू सेंट्रल युनिवर्सिटी
 
3 वर्ष पहले
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