आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ग़ज़ल: ज़िद करता रहा बच्चे की तरह मैं एक मोड़ पर

                
                                                         
                            गुज़रते वक्त को देखा तो देखा मौसम चला गया
                                                                 
                            
चोट के साथ कई चोट देकर मरहम चला गया

जायज़ा लेने जो निकला दुनियां भर के गम का
जितना था पास अपने वो हर गम चला गया

मंजिल दूर है सुनकर मीलों नाप दिया जब
पास होने की अफ़वाह पर फिर कम चला गया

वो 'बेतकल्लुफ' हंसता रहा किसी के गम में
मरा तो सबकी आँखें कर के नम चला गया

मश्क ना करने की गलती ने रिश्ते मिटा दिए कई
पौधों को भूल जाने पर माली का फन चला गया

ज़िद करता रहा बच्चे की तरह मैं एक मोड़ पर
ठहरा रहा मन, झूठ क्यों कहूं मन चला गया

मेरी हथेली से जा गिरता तो भी तसल्ली होती
एक गुब्बारा सीधे आसमान के दामन चला गया

~ नेहाल अहमद
छात्र, बीएड (2021-2023)
मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू सेंट्रल युनिवर्सिटी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर