जिसने कुछ नहीं देखा वो सरकारी गवाह है।
जो चश्मदीद थे,थानों के चक्कर मे तबाह है।
जुर्म न हो हो तो एक पुलिस चौकी खोल दो,
दरोगा मातादीन की चांद पर भी वाह वाह है।
लफ्ज़ो से मक्कारी की बू आने लगी है अब,
पुरखों के पदचिन्हों वाली,तुम्हारी भी राह है।
कब्जों की ज़मीनो के दावे विदेशी मंचों पर,
तजावुज़ को अब इंसानी हुक़ूक़ की चाह है।
हामिदअब चिमटा छोड़,चिमटियां काटता है,
प्रेमचंद के उपन्यास मे एक नया' ईदगाह' है।
-जयंत दिक्षित