सारा जिस्म छलनी है, जनता मौन है।
व्यवस्था ये बदलनी है, जनता मौन है।
लोकतंत्र मे अब मर्यादाएं आवारा हुई,
गोली-गाली चलनी है, जनता मौन है।
सरकारें ही बदलती है,साठ-गांठ नहीं,
माया ही महा ठगनी है,जनता मौन है।
जातिवाद के बीज़,अब फुल फल रहे,
अभी तो बात बनी है, जनता मौन है।
जले नोटों के बंडल,अदालत से बोले,
हम ही ब्लैक मनी है , जनता मौन है।
- जयंत दिक्षित