आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मर्यादाएं आवारा हुई ।

                
                                                         
                            सारा जिस्म छलनी है, जनता मौन है।
                                                                 
                            
व्यवस्था ये बदलनी है, जनता मौन है।
लोकतंत्र मे अब मर्यादाएं आवारा हुई,
गोली-गाली चलनी है, जनता मौन है।
सरकारें ही बदलती है,साठ-गांठ नहीं,
माया ही महा ठगनी है,जनता मौन है।
जातिवाद के बीज़,अब फुल फल रहे,
अभी तो बात बनी है, जनता मौन है।
जले नोटों के बंडल,अदालत से बोले,
हम ही ब्लैक मनी है , जनता मौन है।
- जयंत दिक्षित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर