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"बंद घड़ी"

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                            मेरे पिता ने जो दी थी
        
                                                    
                            
एक अदद हाथ घड़ी।
वो इन दिनों शेल्फ में,
है बेजान सी बंद पड़ी।

गुजरा वक्त नहीं होता
वर्तमान की धड़कन।
बूढ़े की लाठी न बनेगा,
उसका अपना बचपन।

सोचता था बस गया हु,
निज प्रदेश में अभिषिक्त।
बंद घड़ी बोली, तुम भी,
अब होने लगे निर्वासित।
- जयंत दिक्षित
एक महीने पहले
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