सम्पूर्ण विश्व में विद्यमान तरंग है
मानव मनों में छिड़ा जंग है।
भुला हुआ सा सोया हुआ सा,
पड़ा हुआ है अंतर्मन में।
पहचान न पाता भौतिक जगत को,
जिसमें तू जकड़ा हुआ है,
ये तो तेरा रंगमंच है।
रंगमंच को समझ हकीकत,
करता क्यों है अपनी फजीहत।
झांक कर देख ले अंतर्मन तक,
ये तो केवल सूक्ष्म तरंग है।
इन तरंगों तक पहुंचना कठिन है,
करले थोड़ा कठिन जतन है।
सांसों पर सवार कर मन को ,
एहसासों से समझ शरीर संवेदन को।
ये संवेदन ही ले जाएं सूक्ष्म जगत में,
ये जगत ही भरा पड़ा है तरंगों से।
यदि पहचाना तूने इनको ,
सफल करेगा अपने तन को।
इन्हीं तरंग की देन है मानव।
- नीरू गुप्ता
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