घाव सुखा दे समय मगर कटु शब्द न मिटे
समय के मरहम से हर घाव भर जाता है,
लेकिन तीखे शब्दों का घाव अमिट रह जाता है।
वक्त हर एक गहरी चोट को धुँधला कर देता है,
मगर कड़वा बोला गया हर बोल चुभता रहता है।
घाव तो शरीर के भरते हैं दवा लगाने से,
पर मन के छाले नहीं मिटते कभी समझाने से।
बाहरी निशान तो समय के साथ छिप जाते हैं,
भीतर के सन्नाटे पर छाले और उभर आते हैं।
तीर कमान से निकला हुआ कभी नहीं लौटता,
ठीक वैसे ही अपमान का स्वर कभी नहीं घटता।
जख्म दे जाता है इंसान को अपने ही अपनों का,
बिखर जाता है शीशा सा विश्वास सपनों का।
मीठी वाणी से जीवन में फूल खिल जाते हैं,
कटु वचनों से सारे अपने भी बिछड़ जाते हैं।
याद रहता है ज़माने को हर एक ताना कसना,
वक्त भी भूल जाता है कभी कभी आँसू पोछना।
इसलिए जुबान से सोच-समझकर बोल निकालो,
किसी के कोमल मन में न जहर कभी तुम घोलो।
घाव सुखा दे समय मगर कटु शब्द न मिटते हैं,
कड़वे बोलों से अपनों के भी रास्ते कटते हैं।
-नीरज तँवर