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ताजमहल

Neeraj Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलो यह मान लेते हैं तुम्हें नफ़रत नहीं लेकिन,
        
                                                    
                            
बताओ ना मोहब्बत से तुम्हें कैसी अदावत है?

नहीं मंसूब जो तुमसे उसे अपना नहीं कहते
किसी दूजे के साये को कभी साया नहीं कहते

अलग रंगों के फूलों से तुम्हारा राब्ता कम है
यूं लगता है कि दुनिया भर से थोड़ा वास्ता कम है

ज़मीं को मां तो कहते हो मगर तुम मानते कम हो
ख़ुदा का नाम लेते हो उसे तुम जानते कम हो

तलब गुलशन की है तुमको मगर फूलों से झगड़ा है
तुम्हारी बात सच्ची है शहर सारा यह झूठा है ?

ये किस चश्मे से दुनिया देखते हो यह तो बतलाओ
मोहब्बत क्यों समझ आती नहीं है ? यह तो समझाओ

इमारत तक से तुम बदला लिए जाते हो यह किसका ?
क्यों अच्छा नहीं लगता तुम्हें हंसता हुआ चेहरा ?

नहीं क्यों चाहते हो एक हो परिवार यह दुनिया ?
कभी मिल जुलके रहने का सलीक़ा क्यों नहीं सीखा ? 

खड़ी बारूद की ढ़ेरी पर दुनिया है संभल जाओ !
तवस्सुम की इसे मुस्कान की काफी जरूरत है !
बताओ ना मोहब्बत से तुम्हें कैसी अदावत है...

- नीरज झा 

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