पैसा, आखिर तू क्या है?
पैसा, आखिर तू क्या है?
तू अपनों को भी खा जाता है,
सपनों को भी खा जाता है।
मिलूँ पैसे, मैं एक दिन तो पूछूँ—
पैसा, आखिर तेरे पास है क्या?
तू जो कह दे, तेरा हो जाए,
वो फिर आदमी हो या वस्तु।
तू दुनिया का रुख बदल दे,
पैसा, तेरा कोई जात है?
तू हर जगह है,
तेरी ही बातें होती हैं।
तू इतना लोगों के बीच प्रसिद्ध क्यों है?
आखिर तू खाता क्या है?
पैसे से हर बात मनवाई जा सकती है,
बहुत कपड़े उतारे जा सकते हैं,
कहीं पर पर्दा किया जा सकता है।
तुमसे सत्ता को खरीदा जा सकता है।
तुम लोगों को इतनी प्यारी क्यों लगती हो?
तुम खूबसूरत तो हो नहीं,
इतनी जितनी तुम बनती हो।
तुमसे किसी को बचाया जा सकता है,
तुमसे किसी को मारा जा सकता है।
लेकिन तुम्हें पाना तब आसान है
जब कुछ गलत काम हो,
तुम्हें पाना कठिन है
जब कोई काम सही हो।
पैसे से काम का लेना-देना नहीं होना चाहिए।
पैसा पेड़ पर ही उगना चाहिए।
पैसे का पहाड़ होना चाहिए,
जिसे लोग तोड़कर आपस में बाँट लें,
ताकि छोटा-बड़ा भेदभाव खत्म हो,
हो सभी बराबर,
हो सब खुश।
पैसा आदमी को हिजड़ा
और औरत को मर्द बना देता है।
पैसे से आदमी का गंदा चेहरा साफ झलक जाता है,
पैसे से आदमी अपनी गंदगी भी छिपा सकता है।
पैसे से एक चीज़ है
जो कभी नहीं खरीदी जा सकती—
अपने आप का सुकून।
सुकून ढूँढ़ना पड़ता है।
आदमी अंदर से खाली होता है।
आदमी को जब ज़मीर मिलती है,
तो अंदर से सुकून मिलता है।
तब वो अमीर कहलाता है।