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नज़र के खेत में आंखें मिलन की बीज बोती हैं

कुमार प्रकाश

Mere Alfaz
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                            नज़र के खेत में आँखें मिलन की बीज बोती हैं,
        
                                                    
                            
किसी की याद में ये धड़कनें बरबस ही रोती हैं ।

न जाने क्या लिखा था खत में जबसे पढ़ी है वो,
कभी जगती है वो रातें कभी वो दिन में सोती है ।

अगर जाना ही था तो क्यों तू आया था इधर जालिम,
कि अब मिलकर बिछड़ने में बड़ी तकलीफ होती है ।

बता अब कौन आयेगा मुझे बेजा हँसाने को,
निगाहों की खता अब क्यों मेरी धड़कन ये ढोती है ।

मुझे कोई कहा था बावफा है वो मेरा महबूब,
यकीं अब बात पर उसके मुझे क्यों कर न होती है ।

- कुमार प्रकाश
  8800586410
 वाराणसी

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