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मेरा सफर

naved Islam

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपनों को छोड़ गैरों की तरफ जा रहे हैं हम.
        
                                                    
                            
ना जाने किस तरफ जा रहे हैं हम ..
अपनों से अलग एक अजीब दुनिया बसा रहे हैं हम.
ना जाने किस तरफ जा रहे हैं हम..
माँ बाप भाई बहन से बहुत हैं शिकायतें हमें.
बीवी -बच्चों की हर ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं हम..
ये मकान मेरा ये दुकान तेरी.
ना जाने क्यूं इसमें इतना उलझते जा रहे हैं हम..
माँ बाप की दवाई के खर्च से परेशान हो जाते हैं
और दिखावे के लिए गैरों पर दौलत लुटाए जा रहे हैं हम..
वो भी चल रहे हैं इसी राह पर ये सोचकर की शायद दुनिया की रसम निभा रहे हैं हम..
ना जाने किस तरफ जा रहे हैं हम.....

- नवेद इस्लाम

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