आपको और हम को पता ही कहाँ है मालूम ही कब है
राजे-मुस्तक़बिल हमारा यौमिया-मामूल में ही जज़्ब है!
तयशुदा मंज़िल-ए-मक़्सूद सबकी एक है मग़र फिरभी
न जाने क्यूँ जुदा- जुदा तख़य्युल में जी रहे हम-सब हैं!
-एन. आर. कस्वाँ