नहीं मयस्सर हमें जोहड़ के पायतन पे शजर की छाँव
क़िस्मत को रहा अब मंज़ूर नहीं हमारा अपना ही गाँव!
जीवन की चौसर पर गांव से शहर की चाल क्या चली
अपने ही हाथों उल्टे पड़ गए अपने ही मुक़द्दर के दाँव!
-एन. आर. कस्वाँ