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मुक़द्दर के दांव

Nathuram Kaswan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नहीं मयस्सर हमें जोहड़ के पायतन पे शजर की छाँव
        
                                                    
                            
क़िस्मत को रहा अब मंज़ूर नहीं हमारा अपना ही गाँव!
जीवन की चौसर पर गांव से शहर की चाल क्या चली
अपने ही हाथों उल्टे पड़ गए अपने ही मुक़द्दर के दाँव!
-एन. आर. कस्वाँ
14 घंटे पहले
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