एक दिन भक्त ने सीधे मन से, अपने भगवान से पूछा,
"बैकुंठ धाम तो बहुत दूर है, आसमान से भी ऊँचा।
अगर मैं तुमको पुकारूँ प्रभु, तो क्या दौड़े आओगे?
इतनी लंबी इस दूरी को, कैसे पल भर में मिटाओगे?
सूरज, चंदा और तारों से, भी बहुत दूर है धाम तेरा,
फिर इतनी दूर से कैसे प्रभु, तुम सुन पाओगे स्वर मेरा?
मैं एक साधारण सा मानव, यह भेद समझ ना पाता हूँ,
तुम मुझ तक कैसे पहुँचोगे, मैं बस यही सोचता जाता हूँ।"
सुनकर भक्त के भोले वचन, मुस्काए त्रिभुवन-नाथ तभी,
और वात्सल्य से भर करके, प्रभु ने यह मीठी बात कही।
बोले- "हे वत्स! जगत की नाप-तौल में, तू क्यों उलझा जाता है?
इन भौतिक मीलों-कोसों से, क्या परम-तत्व का नाता है?
तू दूरी की चिंता करता है? सर्वत्र समाने वाला मैं!
और समय की चिंता करता है? काल-चक्र घुमाने वाला मैं!
बन वामन भिक्षुक सा छोटा , स्वरूप विराट दिखाने वाला मैं!
दो पग में बलि के ही सम्मुख, संपूर्ण ब्रह्मांड नापने वाला मैं!
तू बस प्रेम से कर आवाहन, मत ढूँढ मुझे आसमानों में,
मैं ही बैकुंठ, ब्रह्मांड भी मैं, मैं बसा हूँ तेरे प्राणों में॥"