जिंदगी भी हो गई हैं मानो अब
मुंबई की लोकल की तरह
दिमाग इधर से उधर भटकते रहता हैं
मुंबई की लोकल की तरह
दोपहर और देर रात थोड़ा
खाली रहता है दिमाग
सुबह शाम भीड़ खयालों की,पिक अवर्स के
मुंबई की लोकल की तरह
अपनेही खयालों में कभी
मंजिल से आगे भी निकल जाता हूं
कभी प्लेटफॉर्म से आगे निकलकर रुकनेवाली
मुंबई की लोकल की तरह
कोशिश करू दिमाग ठंडा रखनेका
कोई न कोई खयाल आ ही जाता हैं
ट्रेसपासर्स से परेशान हुई जाती
मुंबई की लोकल की तरह
हर हादसे के बाद जांच पड़ताल होती हैं
ठोस नतीजा नहीं निकलता कोई
अगले हादसे से तक भटकते रहता हैं दिमाग
मुंबई की लोकल की तरह
- नंदकुमार भागवत