विज्ञापन

मुंबई की लोकल की तरह

Nandkumar Bhagwat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिंदगी भी हो गई हैं मानो अब
        
                                                    
                            
मुंबई की लोकल की तरह
दिमाग इधर से उधर भटकते रहता हैं
मुंबई की लोकल की तरह

दोपहर और देर रात थोड़ा
खाली रहता है दिमाग
सुबह शाम भीड़ खयालों की,पिक अवर्स के
मुंबई की लोकल की तरह

अपनेही खयालों में कभी
मंजिल से आगे भी निकल जाता हूं
कभी प्लेटफॉर्म से आगे निकलकर रुकनेवाली
मुंबई की लोकल की तरह

कोशिश करू दिमाग ठंडा रखनेका
कोई न कोई खयाल आ ही जाता हैं
ट्रेसपासर्स से परेशान हुई जाती
मुंबई की लोकल की तरह

हर हादसे के बाद जांच पड़ताल होती हैं
ठोस नतीजा नहीं निकलता कोई
अगले हादसे से तक भटकते रहता हैं दिमाग
मुंबई की लोकल की तरह

- नंदकुमार भागवत
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Aditya Mishra

1 कविता

View Profile

Anil Pandey

436 कविताएं

View Profile