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बेटी की इच्छा

NAND KISHOR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कह रई बिटिया बाप से अपने
        
                                                    
                            
व्याह रचाना उस घर में
बेटी जैसी बहुऐं रहवें
मेल ना पनपे जा मन में

गाड़ी घोड़ा शौक नहीं
पैदल मन को भाता है
नहीं मोह माया का बिल्कुल
दाल भात को खाता है

ठाट बाट जा महल अटारी
मन को विचलित करते हैं
घास फूस आंगन हो कच्चा
जहां गाय भैंस भी पलते हैं

आजी आजे सास ससुर
जेठ जिठानी और देवर
दो चार नटखट संग ननद
देत दौंतरा दुआरें भीतर

भुंसारे की बांग सुनूं
उरेन द्वारे मैं डारूं
गोबर कूरा साफ सफाई
चौंपे सानी खूब बनाऊं

चकिया आटा पसेई भरे को
दो दो पिंडा रोटी बन रई
खाने वाले दस दस बैठे
चूल्हे पे जा सब्जी पक रई

पति हमारो देवन प्यारो
रिश्ते पूजे जाते हैं
घर हमारों स्वर्ग के जैसो
सेवा मन की करते हैं

मठा महरी भाजी न्यारी
छप्पन भोग हमारे हैं
नोन मिर्च की चटनी साजी
तन की भूख भगाते हैं

देना हमको घर ऐसा
नहीं शिकायत आएगी
बाप मताई लाज लाडली
हर पल इसे बचाएगी

सास ससुर और पति की सेवा
ईश समझ कर करना है
आंगन के सपनों को पूरा
मरते दम तक करना है

कन्या दान जब हुआ था पूरा
आंगन का घर बदला है
इक दहरी से दूजी दहरी
हुई पराई बिटिया है

भय नहीं है किसी बात का
मिलजुलकर सब रहते हैं
आंगन बैठ सांझ की वेरा
ईश वंदना करते हैं
3 महीने पहले
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