आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेटी की इच्छा

                
                                                         
                            कह रई बिटिया बाप से अपने
                                                                 
                            
व्याह रचाना उस घर में
बेटी जैसी बहुऐं रहवें
मेल ना पनपे जा मन में

गाड़ी घोड़ा शौक नहीं
पैदल मन को भाता है
नहीं मोह माया का बिल्कुल
दाल भात को खाता है

ठाट बाट जा महल अटारी
मन को विचलित करते हैं
घास फूस आंगन हो कच्चा
जहां गाय भैंस भी पलते हैं

आजी आजे सास ससुर
जेठ जिठानी और देवर
दो चार नटखट संग ननद
देत दौंतरा दुआरें भीतर

भुंसारे की बांग सुनूं
उरेन द्वारे मैं डारूं
गोबर कूरा साफ सफाई
चौंपे सानी खूब बनाऊं

चकिया आटा पसेई भरे को
दो दो पिंडा रोटी बन रई
खाने वाले दस दस बैठे
चूल्हे पे जा सब्जी पक रई

पति हमारो देवन प्यारो
रिश्ते पूजे जाते हैं
घर हमारों स्वर्ग के जैसो
सेवा मन की करते हैं

मठा महरी भाजी न्यारी
छप्पन भोग हमारे हैं
नोन मिर्च की चटनी साजी
तन की भूख भगाते हैं

देना हमको घर ऐसा
नहीं शिकायत आएगी
बाप मताई लाज लाडली
हर पल इसे बचाएगी

सास ससुर और पति की सेवा
ईश समझ कर करना है
आंगन के सपनों को पूरा
मरते दम तक करना है

कन्या दान जब हुआ था पूरा
आंगन का घर बदला है
इक दहरी से दूजी दहरी
हुई पराई बिटिया है

भय नहीं है किसी बात का
मिलजुलकर सब रहते हैं
आंगन बैठ सांझ की वेरा
ईश वंदना करते हैं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर