कह रई बिटिया बाप से अपने
व्याह रचाना उस घर में
बेटी जैसी बहुऐं रहवें
मेल ना पनपे जा मन में
गाड़ी घोड़ा शौक नहीं
पैदल मन को भाता है
नहीं मोह माया का बिल्कुल
दाल भात को खाता है
ठाट बाट जा महल अटारी
मन को विचलित करते हैं
घास फूस आंगन हो कच्चा
जहां गाय भैंस भी पलते हैं
आजी आजे सास ससुर
जेठ जिठानी और देवर
दो चार नटखट संग ननद
देत दौंतरा दुआरें भीतर
भुंसारे की बांग सुनूं
उरेन द्वारे मैं डारूं
गोबर कूरा साफ सफाई
चौंपे सानी खूब बनाऊं
चकिया आटा पसेई भरे को
दो दो पिंडा रोटी बन रई
खाने वाले दस दस बैठे
चूल्हे पे जा सब्जी पक रई
पति हमारो देवन प्यारो
रिश्ते पूजे जाते हैं
घर हमारों स्वर्ग के जैसो
सेवा मन की करते हैं
मठा महरी भाजी न्यारी
छप्पन भोग हमारे हैं
नोन मिर्च की चटनी साजी
तन की भूख भगाते हैं
देना हमको घर ऐसा
नहीं शिकायत आएगी
बाप मताई लाज लाडली
हर पल इसे बचाएगी
सास ससुर और पति की सेवा
ईश समझ कर करना है
आंगन के सपनों को पूरा
मरते दम तक करना है
कन्या दान जब हुआ था पूरा
आंगन का घर बदला है
इक दहरी से दूजी दहरी
हुई पराई बिटिया है
भय नहीं है किसी बात का
मिलजुलकर सब रहते हैं
आंगन बैठ सांझ की वेरा
ईश वंदना करते हैं
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