चारो तरफ फिजाओं में
दहशत का माहौल व्याप्त हो गया
घर में रहने को इंसान
इतना विवश हो गया
जीने के लिए भोजन पानी
मिलना दुश्वार हो गया
भय के छाये में जिंदगी गुजर रही है आजकल
अपनो से मिलना अब सपना हो गया
कोरोना का खौफ
समाज के लिए अभिशाप हो गया
मर-मर के जीने को
आज इंसान मजबूर हो गया
खुद है इंसान इसके लिए जिम्मेदार
प्रकृति पर विजय पाने को
रहता है हमेशा तैयार
इसलिए आज कोरोना के रूप में
महामारी बन कर छाई है
पूरी दुनिया को अपने आगोश में समाई है
मौत का तांडव कर रही है
प्रकृति अपना बदला ले रही है
हँस रहा है पशु-पक्षी, जानवर
कैद में देख इंसानों को
याद दिला रहा है अपनी दास्ता
जब पिंजरे में रखता था कैद
पशु-पक्षी, जानवरों को
घुटती थी आत्मा आजाद होने को
देख मानव कुदरत का खेल
कैद में है तू, आसमाँ में उड़ रहा हूं मैं
शुद्ध वातावरण में जी रहा हूं मैं
घुटन और खौफ जी रहा है तू
मौत आहिस्ता-आहिस्ता
दस्तक दे रही है तेरे द्वार
अब भी सुधर जा मानव
सुन मेरी पुकार
लक्ष्मण रेखा पार न करना
कोरोना को घर से दूर ही रखना
धीरे-धीरे महामारी हो जायेगा दूर
सब कुछ ठीक हो जायेगा पहले जैसा
कोई गलती करने की
फिर से न करना भूल
खुद भी जीना और दूसरो को जीने देना
प्रकृति से फिर न पंगा लेना
वरना अबकी ऐसा कहर बरसायेगी
दुनिया मिट्टी में मिल जायेगी ।
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