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मेरा कस्बा, मेरी पहचान

mursaleen fatma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            न शहर है मेरा, न गाँव है मेरा,
        
                                                    
                            
इन दोनों के बीच बसा एक संसार है मेरा।
न पूरी तरह शहर, न गाँव की सूरत,
मेरा कस्बा ही है मेरी सबसे प्यारी मूरत।

हर रूप को मैंने यहाँ बदलते देखा है,
हर रंग को चढ़ते और ढलते देखा है।
पहले मिट्टी के घर हुआ करते थे,
अब पक्के मकानों के सिलसिले दिखते हैं।

जहाँ कभी जंगल खिला करते थे,
आज वहाँ दुकानों के मेले सजते हैं।
हर रंग, हर रूप बदल गया,
मेरा गाँव अब नगर-सा सँवर गया।

कपड़े, किताबें, मिठाइयाँ और पकवान,
नई दर्ज़ी की दुकानें, विद्यालय और राशन की दुकान।
हर ज़रूरत का सामान यहाँ मौजूद है,
किसी चीज़ की कमी का अब कहाँ एहसास है?

बाहर जाने की चाह भला क्यों हो,
जब हर ज़रूरत का ठिकाना यहीं हो।
बैंक हो या अस्पताल, हर सुविधा यहाँ दिखती है,
मेरा छोटा-सा कस्बा अब नगर-सा लगता है।

बचपन की वो गलियाँ अब वैसी नहीं रहीं,
यादों की वो तस्वीरें भी पहले जैसी नहीं रहीं।
पर दिलों में बसे एहसासों को कैसे भुलाएँ,
बीते हुए लम्हों को यादों से कैसे मिटाएँ?

लोग बदले हैं, वक़्त भी बदल गया,
पर दिलों में बसा अपनापन आज भी ज़िंदा है।
आज भी यहाँ लोग एक-दूजे के लिए हाथ बढ़ाते हैं,
कोई गिर जाए राह में, तो मिलकर उठाते हैं।

ग़रीबों के लिए भी यहाँ सहारे मिल जाते हैं,
मुश्किल वक़्त में कई हाथ मदद को आ जाते हैं।
ऐसी इंसानियत और ऐसा अपनापन,
भला और कहाँ मिलेगा ऐसा प्यारा आँगन?

शहर घूमे, राज्य घूमे, घूमे गाँव की राह,
देखे कितने रंग, कितनी दुनिया, कितनी चाह।
पर दिल ने हर बार यही पैग़ाम दिया,
मेरे कस्बे-सा सुकून कहीं और न मिला।

न शहर की भीड़ में, न गाँव की छाँव में,
जो बात है मेरे कस्बे की मिट्टी और हवाओं में।
यहाँ की यादें, यहाँ के लोग, यहाँ का प्यार,
मेरे दिल में बसता है मेरा कस्बा हर बार।

न शहर है मेरा, न गाँव है मेरा,
इन दोनों के बीच बसा एक संसार है मेरा।
दुनिया चाहे कितनी भी खूबसूरत नज़र आए,
मेरे कस्बे-सा अपना कोई और कहाँ कहलाए!
एक घंटा पहले
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