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कान्हा तुमसे एक प्रार्थनाI

Muneer Shamee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कान्हा! तुमसे एक प्रार्थना,
        
                                                    
                            
मेरे मन को शुद्ध बनाना,
झूठ, कपट और अहंकार से,
मुझको सदा बचाना।

दुखियों के आँसू पढ़ सकूँ मैं,
ऐसी दृष्टि देना,
गिरते हुए किसी इंसान को,
अपना हाथ देना।

मेरे शब्द किसी को चुभें नहीं,
ऐसी वाणी देना,
अंधियारे में राह दिखाऊँ,
ऐसा ज्ञान देना।

जब जीवन में संकट आए,
मन मेरा घबराए,
गीता के संदेश की ज्योति,
मुझमें साहस जगाए।

मेरे भीतर प्रेम जगा दो,
मन में करुणा भर दो,
कान्हा! मेरे छोटे जीवन को,
मानवता से भर दो।

मुरली की वह तान सुनाओ,
जो मन के तार हिला दे,
रूठे हुए रिश्तों के भीतर,
फिर से स्नेह खिला दे।

जहाँ स्वार्थ की धूप खड़ी है,
वहाँ दया की छाँव करो,
नफरत के इस शोर में कान्हा,
प्रेम भरा संवाद करो।

कुरुक्षेत्र आज भी भीतर है,
मन ही मन संघर्ष मचा है,
हे पार्थ-सारथी! कर्मयोग का,
फिर से हमें ज्ञान सुना दो।

न धन चाहिए, न यश चाहिए,
बस इतना वरदान मिले—
हर मानव के हृदय में कान्हा,
थोड़ा-सा इंसान मिले।
-मुनीर शमी
 
एक महीने पहले
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