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बचपन लौट आया

Muneer Shamee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज राखी के बहाने
        
                                                    
                            
फिर बचपन लौट आया,
सूना पड़ा था जो आँगन
फिर हँसता हुआ नज़र आया।

वो काग़ज़ की नावें,
वो मिट्टी के खिलौने,
वो छोटी-सी दुनिया
और अपने ही सपने।

वो भाई का चिढ़ाना,
बहन का रूठ जाना,
फिर माँ के कहने पर
चुपके से मुस्कुराना।

आज कलाई पर धागा है,
पर आँखों में पूरा बचपन,
एक राखी में सिमट आया
घर, आँगन और अपनापन।

दुनिया चाहे दूर ले जाए,
रिश्ते कहाँ दूर होते हैं?
सच्चे भाई-बहन के बंधन
समय से भी मज़बूत होते हैं।

भैया, आज राखी पर
बस इतना-सा कहना है,
दुनिया चाहे बदल जाए,
तुमको वैसा ही रहना है।

बचपन की उन गलियों को
दिल से कभी भुलाना मत,
मेरी छोटी-छोटी बातों पर
मुझसे कभी रूठ जाना मत।

मैंने बाँधा है धागा,
इसमें केवल प्यार नहीं,
इसमें मेरी हर दुआ है,
इसमें कोई व्यापार नहीं।

तुम्हारी राहों में खुशियाँ हों,
हर सपना साकार हो,
जब भी जीवन मुश्किल हो,
हौसला तुम्हारा हथियार हो।

और सुनो मेरे प्यारे भैया,
रक्षा मेरी ही मत करना,
मेरे सपनों की भी इज़्ज़त करना,
मेरी उड़ानों को मत रोकना।
-मुनीर शमी
 
7 घंटे पहले
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