आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बचपन लौट आया

                
                                                         
                            आज राखी के बहाने
                                                                 
                            
फिर बचपन लौट आया,
सूना पड़ा था जो आँगन
फिर हँसता हुआ नज़र आया।

वो काग़ज़ की नावें,
वो मिट्टी के खिलौने,
वो छोटी-सी दुनिया
और अपने ही सपने।

वो भाई का चिढ़ाना,
बहन का रूठ जाना,
फिर माँ के कहने पर
चुपके से मुस्कुराना।

आज कलाई पर धागा है,
पर आँखों में पूरा बचपन,
एक राखी में सिमट आया
घर, आँगन और अपनापन।

दुनिया चाहे दूर ले जाए,
रिश्ते कहाँ दूर होते हैं?
सच्चे भाई-बहन के बंधन
समय से भी मज़बूत होते हैं।

भैया, आज राखी पर
बस इतना-सा कहना है,
दुनिया चाहे बदल जाए,
तुमको वैसा ही रहना है।

बचपन की उन गलियों को
दिल से कभी भुलाना मत,
मेरी छोटी-छोटी बातों पर
मुझसे कभी रूठ जाना मत।

मैंने बाँधा है धागा,
इसमें केवल प्यार नहीं,
इसमें मेरी हर दुआ है,
इसमें कोई व्यापार नहीं।

तुम्हारी राहों में खुशियाँ हों,
हर सपना साकार हो,
जब भी जीवन मुश्किल हो,
हौसला तुम्हारा हथियार हो।

और सुनो मेरे प्यारे भैया,
रक्षा मेरी ही मत करना,
मेरे सपनों की भी इज़्ज़त करना,
मेरी उड़ानों को मत रोकना।
-मुनीर शमी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर