जब कुरुक्षेत्र की धरती पर, मृत्यु स्वयं मुस्काई थी, जब धर्म खड़ा था प्रश्न लिए, और नीति भी घबराई थी।
जब राजमुकुट के लोभ तले, संबंध सभी दम तोड़ रहे, तब एक सूत का पुत्र खड़ा था, भाग्य से नाते तोड़ रहा।
वह कर्ण! जिसे संसार मिला, पर माँ का आँचल मिल न सका,
जिसके भीतर सूर्य जला, पर जन्म का परिचय खिल न
सका। जिसने निज बल से धनुष उठाया, अपनी प्रतिभा को मान दिया, पर कुल के ठेकेदारों ने, उसको केवल अपमान दिया। क्या दोष था उसका, बोलो तुम? क्या जन्म स्वयं अपराध हुआ?
क्या माँ की विवशता के कारण, पुत्र सदा बर्बाद हुआ?
क्या वीर वही जो राजभवन की स्वर्णिम गोदी में पलता है?
या वीर वही जो ठोकर खाकर, स्वयं अग्नि बन जलता है? ---मुकेश कुमार वर्मा "बागी" लगभग 25 दिन पूर्व मैंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की कालजयी कृति ‘कुरुक्षेत्र’ को पुनः पढ़ा था। उसी समय मन में एक विचार अंकुरित हुआ कि क्यों न मैं भी कुछ ऐसा लिखने का प्रयास करूँ?
इन दिनों उसी विचार को शब्दों में ढालने का प्रयास कर रहा हूँ। अब तक अपनी रचना @"कर्ण:सूत पुत्र का अंतिम प्रश्न" के तीन सर्ग लिख चुका हूँ। शेष चार सर्गों में कुछ अशुद्धियाँ रह गई हैं, जिन्हें सुधारने के पश्चात सातों सर्ग एक साथ प्रस्तुत करूँगा।
मैं भली-भाँति जानता हूँ कि दिनकर जी की महान कालजयी कृति ‘कुरुक्षेत्र’ की भावगत गहराइयों और साहित्यिक ऊँचाइयों को छू पाना भी मेरे लिए सहज नहीं है।न तो मेरा उद्देश्य उनकी महानता की बराबरी करना है और न ही ऐसा कोई दावा। यह तो बस मेरे मन के भावों को शब्द देने का एक विनम्र प्रयास है।
मैंने केवल महाभारत के अपने सर्वाधिक प्रिय पात्र ‘कर्ण’ को अपनी दृष्टि, अपनी संवेदनाओं और अपने शब्दों में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।