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इश्क वफा और तुम .... जब से थामा है हाथों में हाथ तुम्हारा हम आवारगी को गले नहीं लगाते

Mukesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब से थामा है हाथों में हाथ तुम्हारा
        
                                                    
                            
हम आवारगी को गले नहीं लगाते।।

मोहब्बत में वफा की कसम खाई है हमने
हम चमन में फूलों को भी हाथ नहीं लगाते।।

अब आंखों में चलते हैं इश्क तुम्हारा लेकर
हम शहर के मयखानों को मुंह नहीं लगाते।।

अब तो हर वक्त साथ है तुम्हारे बदन की खुशबू
अब जवानी में हमारे कदम नहीं डगमगाते।।

रात को सोते हैं ख्वाब तुम्हारा लेकर
अब हम चांद पर नजर नहीं गढ़ाते।।

हुआ है नसीब तुम्हें बे पैरहन देखें
अब हम आंखों पर चश्मा नहीं लगाते।।

अब तो तकिए को रहता है इंतजार तुम्हारा
अब हम दरवाजे पर ताला नहीं लगाते।।

कहीं लग ना जाए तुम पर इल्जाम जफा का
हम अब दर्द में भी आंसू नहीं बहाते।।

जब से थामा है हाथों में हाथ तुम्हारा
हम आवारगी को गले नहीं लगाते।।


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