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ग़ज़ल : उन से मिलो तो

Mradul Kumarsingh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उन से मिलो तो जान के दिल में सहने की ताक़त है कि नहीं
        
                                                    
                            
ज़ख़्म को छेड़ के पूछते हैं वो दर्द में राहत है कि नहीं
वो जो हमारे बन कर सबकुछ बैठ तुम्हारे पास गए
उनकी बनावट बतलाएं पर सुनने की हिम्मत है कि नहीं
पांव धरा कब याद नहीं कुछ पांव उठा क्यों ख़बर नहीं
हैं किस राह पे ये भी न मालूम हाय क़यामत है कि नहीं
भूल गए सब कहना सुनना याद रहा तो बस इतना
पूछती थी वो होठ दबा कर मुझसे मोहब्बत है कि नहीं
बाद गुज़रने के लगता है वक़्त से तेज़ नहीं कुछ भी
बात ये हिज्र की लम्बी तन्हा रात की बाबत है कि नहीं
मयख़ाना इक रात खुलेगा पायी ख़बर उड़ती उड़ती
राह पे है घर देखता हूँ पर राह पे हालत है कि नहीं
तेरी गली में पांव पड़ा जो नज़र न तो उठ पायेगी
झांक गिरेबां में देखूंगा थोड़ी शराफ़त है कि नहीं


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