बहुत हो चुका अंधियारा अब एक सवेर सही
इन ग़मों में खुशियां चाहिए कुछ देर सही कुछ देर सही
मंज़िल ख़ुद ही तय करूंगा मुझको चलना सिखला दो
छू लूंगा मैं आसमा भी बस उड़ने का हुनर बता दो
एक मिले उम्मीद की चिंगारीॉ
बस एक मिले उम्मीद की चिंगारी
फिर सारी उम्र राख का ढेर सही
बहुत हो चुका अंधियारा अब एक सवेर सही
इन ग़मों में खुशियां चाहिए कुछ देर सही कुछ देर सही
- मोहित कौशिक
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।