चाय का कप आधा साझा करने को,
ठंडी रातों में कंबल की सिलवटें भरने को।
जब आँखें भरी हों थकान से,
तो बिना कहे सिरहाने पैर धरने को।
चश्मे का खोया फ्रेम ढूँढ़ने को,
काँपते हाथ से दवा की शीशी खोलने को।
जब आवाज़ भी साथ न दे पाए,
तो ख़ामोशी की भाषा सहज ही बोलने को।
सुबह की पहली अख़बार मिलकर बाँचने को,
चाय की केतली को आँच से संभालने को।
जब मौसम अचानक करवट बदलने लगे,
तो भीगे हुए कपड़े आँगन से उतारने को।
बीते दिनों की कहानियाँ फिर से दूहराने को,
बिना सुर-ताल के भी पुराना गीत गुनगुनाने को।
जब रात का सन्नाटा डराने लगे मन को,
तो माथा चूमकर सुकून की नींद सुलाने को।
आँगन की ढलती हुई धूप सेंकने को,
पुराने एल्बम के पन्ने मिलकर देखने को।
जब रास्ते धुँधले लगने लगें,
तो बस एक-दूजे का सहारा टेकने को।
बिना किसी बात के भी मुस्कुराने को,
उम्र के इस ढलते सफ़र को सुहाना बनाने को।
जब दुनिया की हर रौनक़ बेगानी लगने लगे,
तो बस एक-दूसरे की आँखों में घर बसाने को।
इसलिए एक साथी ज़रूरी है, जो तैयार हो
इस उम्र से उस उम्र तक साथ चलने को।