अंदर ही अंदर वो लोग कितना रोते होंगे
गमों को खाकर अश्क़ पीकर कैसे सोते होंगे
उनकी आँखों में ना कोई सपना है, ना ही चाहत अब कुछ पाने की
जिनका सब कुछ लुट चुका हो, उनको क्या डर है मौत आने की
काश हमारा तनिक इनका भी ख्याल करने का जी करता
तो शायद इनका दुनियाँ में कुछ दिन और रहने का जी करता
मगर हमको तो मतलब है खुद की जेब भरने से
हमें क्या फर्क पड़ता औरों के ख़ुदकुशी करने से
इस दौर के लोगों में ये कैसी भ्रष्टता भर चुकी है
इंसान तो बहुत जिन्दा है मगर इंसानियत मर चुकी है
ये सारे रंगीन सुबह व हर हसीं शाम के दिन
एक दिन गुजर जायेंगे ऐसे व आराम के दिन
आज बहार तो ये मत भूलो की कभी पतझड़ भी आता है
औरों की हालात पर हंसने वालों तब वक्त बहुत रुलाता है
कोई भी महल कोई ईमारत हमेशा काम नहीं आयेंगे
एक दिन मौत के फरिश्ते तुझको भी लेकर जायेंगे
मैं तो बस इतना कहूंगा हो सके तो इंसान बनों
किसी के लाठी का सहारा तो किसी के होंठों की मुस्कान बनों
~ MAKHAN
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।