गुण एकल अटल अनुरागी होइहिं निश्चल प्रेम परिभाषित करहिं
छल,व्यभिचार,असत्य,अविनीति सबु दुर प्रेम पराजित करहिं
मन अविश्वासी भयावह दैत्य सम अति पवित्र उर खंडित करहिं
यथाविधि रीतिबद्ध समय में नियति वैरी को दंडित करहिं
लौकिक अलौकिक में विलीन होई सूक्ष्म दोष क्रम वर्जित करहिं
प्रेमाख्यान वियोगी के होवत अर्द्धरति अमरत्व अर्जित करहिं
प्रेमरीत अभिजितिक मार्गम् भयग्रस्त दुनियाँ बाधित करहिं
किंतु विवेक,शील चित्त में धीरज नेही विकसित करहिं
कौमुद पूनम पूर्ण सुधाकर कौमुदी रूप सुशोभित करहिं
देख-देख प्रत्यक्ष मोहिनी पाहन हृदय मोहित करहिं
प्रियतम प्रेम अनुमोदित जावै मनोरम स्वप्नम कल्पित करहिं
तब हरषाए हिय अन्तर्मन में मंगल गाए अर्चन नित करहिं
स्पर्श हृदय से हृदय कर दीन्हीं मोहे नेह रंग रंजित करहिं
अब हृदय में वास तुम्हारो श्रद्धा सहित तुम्हें अंजित करहिं
लखि मेरे इष्ट कृपा करि देहिं भावी जीवन सब हित करहिं
एक प्रीति अनुकंपा तुम्हारी अंतिम सब विष अमृत करहिं.....