ख़ामोशी ऐसी जिसे तुमने कभी समझने की कोशिश नहीं की ,
तुमने कभी जाना ही नहीं की मैं क्या चाहती थी,
सच कभी सुना ही नहीं, मुझे पहचाना ही नहीं,
कि मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती थी,
मैं तो बस तुम्हे चाहती थी,
तुम्हें अपनी आदत नहीं,
तुम्हारी आदत बनना चाहती थी !!
तुमने कभी मेरी खामोशी को समझा ही नहीं,
कि मैं तुम्हें छुप-छुप के जब देखा करती थी,
तुमसे बहुत प्यार किया करती थी,
तुम्हारा हर पल इंतज़ार जब किया करती थी !!
मन में बस खुआब सजाया करती थी ,
आपके साथ होने के.....
तुम उस दर्द से गुजरे ही नहीं ,
आँखों में आने वाले आंसू को परखा ही नहीं
वो आंसू, जो कभी बहे ही नहीं ,
जो अक्सर तुम्हे सोचकर या तुम्हारी बाते करने पर आया करते थे ,
बस तुम्हारे जिक्र से ही इन आँखों की नमी को बढ़ाया करते थे ,
तुमने कभी उस ख़ामोशी को जाना ही नहीं ,
जो अक्सर तुम्हारे पास होने पर में चुप हो जाया करती थी ,
तुम्हारी बातों पर शर्माया करती थी ,
तुमने मुझे कभी देखा ही नहीं ,
जब मैं अक्सर सिर्फ तुम्हारी बातें किया करती थी ,
तुम्हे सोचकर हसा करती थी !!
तुमने कोशिश ही नहीं की मेरी खामोशी को समझने की
मैं जब तुमसे आँखों ही आँखों में इशारे किया करती थी ,
अक्सर दिल में छुपी बातों को आँखों से बया करती थी !!
तुमने कभी कोशिश ही नहीं की
मेरी उन किताबों को पढ़ने की
जिसमें मैं अक्सर तुम्हारे बारे में लिखा करती थी !
तुम ही वजह थे जिससे मेरी शायरी बना करती थी!!
मैं आज भी आपसे कोई चाहत नहीं मांगती
बस आपके दिल में थोड़ी सी जगह चाहती हूँ ,
बयां नहीं कर सकती लब्जों को
इसलिए शब्दों में कहती हूँ
इस बात से तो तुम भी हो बेखबर ,
मेरे दिलबर
कि मैं आज भी तुम्हारे दिल में रहती हूँ !!
कि मैं आज भी तुम्हारे दिल में रहती हूँ !!
-शीतल_सिंह
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