ये गम जब ज़ियादा सताने लगे
ख़ुशी के वो दिन याद आने लगे
उसे मैंने खोया है इक पल में ही
जिसे पाने में भी जमाने लगे
किसी ने ख़रीदा नहीं सस्ते में
वो फिर दिल की क़ीमत घटाने लगे
कई पेड़ जड़ से कटे हैं यहां
नई सड़कें जब हम बनाने लगे
हमारी वफ़ा रास आई नहीं
सितम ये वो ख़त भी जलाने लगे
वो शायद कभी लौट के आएँगे
यहीं सोच हम घर सजाने लगे
सिद्धार्थ सैनी ' साद '