आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ये गम जब ज़ियादा सताने लगे

                
                                                         
                            ये गम जब ज़ियादा सताने लगे
                                                                 
                            
ख़ुशी के वो दिन याद आने लगे

उसे मैंने खोया है इक पल में ही
जिसे पाने में भी जमाने लगे

किसी ने ख़रीदा नहीं सस्ते में
वो फिर दिल की क़ीमत घटाने लगे

कई पेड़ जड़ से कटे हैं यहां
नई सड़कें जब हम बनाने लगे

हमारी वफ़ा रास आई नहीं
सितम ये वो ख़त भी जलाने लगे

वो शायद कभी लौट के आएँगे
यहीं सोच हम घर सजाने लगे

सिद्धार्थ सैनी ' साद '
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर