मानव रूपी वृक्ष में पोखर कई है
हर पोखर में जीव जन्तु कोई खाली नही है
क्रोध नाम की पोखर में तीर तलबार भाला
ये शब्दों के खंजर शब्दों से मार डाला
प्रेम नाम की पोखर विध्वंश रोकती
टूटे शीशे को फिरसे जोड़ती
इसमें तस्वीर मां की
जो रचना सृष्टि की कर डालती
एक पोखर झिलमिल करती
चारों ओर उजियारा
इसमें मेरा राम बैठा
जो तन मन धन सारा